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💖════❥❥ जय श्रीराधे   💖════❥❥🍃🌿🌺🌺🔱  जय श्रीकृष्ण 🔱🌺🌺🌿🍃दोहा :- “मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृन्दावन की रेनु | नंदकिसोर चराव...
12/04/2018

💖════❥❥ जय श्रीराधे 💖════❥❥

🍃🌿🌺🌺🔱 जय श्रीकृष्ण 🔱🌺🌺🌿🍃

दोहा :- “मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृन्दावन की रेनु | नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु || मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन | चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु || इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनी के ऐनु | सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पब्रूच्छ सुरधेनु ||”

अर्थ :- राज सारंग पर आधारित इस पद में सूरदास कहते है की ब्रजरज धन्य है जहां नंदपुत्र श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं | उसी भूमी पर श्यामसुंदर का स्मरण करने से मन को परम शांति मिलती हैं | सूरदास मन को प्रभोधित करते हुए कहते हैं की अरे मन ! तू कहे इधर उधर भटकता हैं | ब्रज में ही रह, जहां व्यावहारिकता से परे रहकर सुख की प्राप्ति होती हैं | यहां न किसी से लेना, न किसी को देना | सब ध्यानमग्न हो रहे हैं | ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बरतनों से जो कुछ प्राप्त हो उसी को ग्रहण करने से ब्रह्ममत्व की प्राप्ति होती हैं | सूरदास कहते हैं की ब्रजभूमि की समानता कामधेनु भी नहीं कर सकती | इस पद में सूरदास ने ब्रज भूमी का महत्व प्रतिपादित किया हैं |

*🙏🏻राधे कृष्णा🙏🏻*जब भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा जी को तीनों लोकों का स्वामी बना दिया तो सुदामा जी की संपत्ति देखकर यमराज ...
29/03/2018

*🙏🏻राधे कृष्णा🙏🏻*

जब भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा जी को तीनों लोकों का स्वामी बना दिया तो सुदामा जी की संपत्ति देखकर यमराज से रहा न गया !

यम भगवान को नियम कानूनों का पाठ पढ़ाने के लिए अपने बहीखाते लेकर द्वारिका पहुंच गये !

भगवान से कहने लगे कि - अपराध क्षमा करें भगवन लेकिन सत्य तो ये है कि यमपुरी में शायद अब मेरी कोई आवश्यकता नही रह गयी है इसलिए में पृथ्वी लोक के प्राणियों के कर्मों का बहीखाता आपको सौंपने आया हूँ !

इस प्रकार यमराज ने सारे बहीखाते भगवान के सामने रख दिये भगवान मुस्कुराए बोले - यमराज जी आखिर ऐसी क्या बात है जो इतना चिंतित लग रहे हो ?

यमराज कहने लगे - प्रभु आपके क्षमा कर देने से अनेक पापी एक तो यमपुरी आते ही नही है वे सीधे ही आपके धाम को चले जाते हैं और फिर आपने अभी अभी सुदामा जी को तीनों लोक दान दे दिए हैं । सो अब हम कहाँ जाएं ?

यमराज भगवान से कहने लगे - प्रभु ! सुदामा जी के प्रारब्ध में तो जीवन भर दरिद्रता ही लिखी हुई थी लेकिन आपने उन्हें तीनों लोकों की संपत्ति देकर विधि के बनाये हुए विधान को ही बदलकर रख दिया है !

अब कर्मों की प्रधानता तो लगभग समाप्त ही हो गयी है !

भगवान बोले - यम तुमने कैसे जाना कि सुदामा के भाग्य में आजीवन दरिद्रता का योग है ?

यमराज ने अपना बही खाता खोला तो सुदामा जी के भाग्य वाले स्थान पर देखा तो चकित रह गए देखते हैं कि जहां श्रीक्षय’ सम्पत्ति का क्षय लिखा हुआ था !

वहां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उन्ही अक्षरों को उलटकर ‘उनके स्थान पर यक्षश्री’ लिख दिया अर्थात कुबेर की संपत्ति !

भगवान बोले - यमराज जी ! शायद आपकी जानकारी पूरी नही है क्या आप जानते हैं कि सुदामा ने मुझे अपना सर्वस्व अपर्ण कर दिया था ! मैने तो सुदामा के केवल उसी उपकार का प्रतिफल उसे दिया है !

यमराज बोले - भगवन ऐसी कौनसी सम्पत्ति सुदामा ने आपको अर्पण कर दी उसके पास तो कुछ भी नही !

भगवान बोले - सुदामा ने अपनी कुल पूंजी के रूप में बड़े ही प्रेम से मुझे चावल अर्पण किये थे जो मैंने और देवी लक्ष्मी बड़े प्रेम से खाये थे !

जो मुझे प्रेम से कुछ खिलाता है उसे सम्पूर्ण विश्व को भोजन कराने जितना पुण्य प्राप्त होता है.बस उसी का प्रतिफल सुदामा को मैंने दिया है !

ऐसे दयालु हैं हमारे प्रभु श्रीकृष्ण भगवान जिन्होंने न केवल सुदामा जी पर कृपा की बल्कि द्रौपदी की बटलोई से बचे हुए साग के पत्ते को भी बड़े चाव से खाकर दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों सहित सम्पूर्ण विश्व को तृप्त कर दिया था ओर पांडवो को श्राप से बचाया था !!

।। जयजय श्रीराधे ।।

Do not expect honor, but offer all respect to others. Always chant the holy name of Lord Krishna, and within your mind r...
02/09/2017

Do not expect honor, but offer all respect to others. Always chant the holy name of Lord Krishna, and within your mind render service to Radha and Krishna in Vrndavana.
HARE KRISHNA TO ALL...

Raas Raaseshwari Shri Radhey appeared in Brij Mandal as the lovely daughter of Shri Vrishbhanuji in Barsana on Bhadrapad...
28/08/2017

Raas Raaseshwari Shri Radhey appeared in Brij Mandal as the lovely daughter of Shri Vrishbhanuji in Barsana on Bhadrapad Shukla Ashtami i.e. eighth day of bright fortnight of the Bhadrapad month. Her village Barsana is located between Goverdhan and Nandgaon. The entire area is agricultural in nature and land beyond fields is densely forested. These forests are inhabited by large colonies of monkeys and peacocks apart from other wild animals. Peacocks entering inside the populated area and dancing on the rooftops is a common site here. Similarly monkeys entering into houses and running away with food items or anything that they may fancy about are a frequent occurrence. Brijvasi, as the residents of these areas are known, are a kind hearted lot. They do not get angered and hurt the monkeys rather they just scare them away. The area is dotted with a large numbers of natural springs and ponds which are called as Kunds. So this beautiful land has the distinction of being the playground of Radha and Krishna.
In this beautiful land of Brij, Radha’s birthday is celebrated with the same joy and zeal as Krishna’s. Again the temples are decorated, special prayers are offered and devotional songs congratulating Sh Vrishbhanu on birth of a daughter are sung in chorus.
Devi Radha, the mother eternal, is very kind hearted and loving. She is the driving force behind all of the Krishna’Leelas . The spirit of Brij Bhakti is Raasleela, where Radha is supreme. Lord Krishna seeks her permission and it is at her pleasure that the Leela is continued.
As ordinary mortal beings, we all know it is much easier to gain favors from mother. Mother gives us birth, mother nourishes us, mother protects us, mother educates us, mother gives us character and virtues, mother gives us everything and in difficult times we call back her for overcoming our own weakness. So, on this occasion pray to universal mother....

JAI JAI SHRI VRISHABHANU DULARI

श्रीमद्भागवत १.२.२७रजस्तम:प्रकृतय: समशीला भजन्ति वै । पितृभूतप्रजेशादीन्श्रियैश्वर्यप्रजेप्सव: ॥ २७॥अनुवाद :जो लोग रजोगु...
19/08/2017

श्रीमद्भागवत १.२.२७
रजस्तम:प्रकृतय: समशीला भजन्ति वै । पितृभूतप्रजेशादीन्श्रियैश्वर्यप्रजेप्सव: ॥ २७॥
अनुवाद :
जो लोग रजोगुणी तथा तमोगुणी हैं वे पितरों, अन्य जीवों तथा उन देवताओं की पूजा करते हैं, जो सृष्टि सबन्धी कार्यकलापों के प्रभारी हैं, क्योंकि वे स्त्री, धन, शक्ति तथा सन्तान का लाभ उठाने की इच्छा से प्रेरित होते हैं।
तात्पर्य :
यदि मनुष्य भगवान् के धाम को वापस जाने के बारे में गम्भीर है तो उसे किसी भी कोटि के देवता की पूजा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवद्गीता (७.२०,२३) में ऐसा स्पष्ट कहा गया है कि जो लोग भौतिक भोगों के पीछे पागल रहते हैं, वे अपने क्षणिक लाभ के लिए विभिन्न देवताओं के पास जाते हैं, किन्तु ऐसे लाभ तो अल्पज्ञों के लिए हैं। हमें कभी भी भौतिक भोग की इच्छा को प्रबल नहीं बनाना चाहिए। भौतिक भोग जीवन में उतना ही अपनाया जाय जितना जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए जरूरी हो, न उससे कम, न ज्यादा। अल्पज्ञों के लिए हैं। हमें कभी भी भौतिक भोग की इच्छा को प्रबल नहीं बनाना चाहिए। भौतिक भोग जीवन में उतना ही अपनाया जाय जितना जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए जरूरी हो, न उससे कम, न ज्यादा। अधिक भौतिक भोग अपनाने का अर्थ है, अपने आप को भौतिक संसार के कष्टों से अधिकाधिक बाँधना। जो लोग भौतिकता में निमग्न हैं, उन्हें अधिक धन, अधिक स्त्रीयाॅ तथा झूठी कुलीनता जैसी वस्तुएँ चाहिए, क्योंकि वे विष्णु की पूजा से प्राप्त होने वाले लाभ से अनजान रहते हैं। विष्णु की पूजा से इस जीवन में लाभ तो मिलता ही है, किन्तु मृत्यु के बाद अगले जीवन में भी लाभ मिलता है। इन सिद्धान्तों को भूल कर जो लोग अधिक धन, अधिक स्त्रीयाॅ तथा अधिक सन्तान चाहते हैं, ऐसे लोग विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं। जीवन का लक्ष्य जीवन के कष्टों को समाप्त करना है, उन्हें बढ़ाना नहीं। भौतिक सुख के लिए देवताओं के पास जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। ये देवता भगवान् के दास मात्र हैं। फलत: ये जल, वायु, प्रकाश आदि के रूप में जीवन की आवश्यकताएँ प्रदान करने के लिए बाध्य हैं। मनुष्य को चाहिए कि जीने के लिए कठोर श्रम करे और इसी श्रम के फल से भगवान् की पूजा करे। यही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। उसे भगवान् में श्रद्धा रखते हुए उचित ढंग से अपने वृत्तिपरक धर्म का पालन करना चाहिए। इससे वह धीरे-धीरे भगवान् के धाम पहुँच सकेगा। जब भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् व्रजधाम में विद्यमान थे, तो उन्होंने इन्द्र की पूजा बन्द करा दी थी और व्रजवासियों को सलाह दी थी कि वे अपने व्यवसाय (कर्म) द्वारा ईश्वरकी पूजा करें और उनमें श्रद्धा रखें। भौतिक लाभ के लिए बहुदेव-पूजा धर्म की विकृति है। भागवत के प्रारम्भ में ही इस प्रकार की धार्मिकता की निन्दा कैतवधर्म कह कर की गई है। संसार में केवल एक ही धर्म है जिसका पालन हर एक को करना चाहिए और वह है भागवत-धर्म जो केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा सिखाता है, अन्य किसी की नहीं।
श्रीमद्भागवत,श्रील प्रभुपाद
हरे कृष्ण

पलकें झुकें , और नमन हो जाए…….!!मस्तक झुके, और वंदन हो जाए……!!ऐसी नज़र, कंहाँ से लाऊँ, मेरे कान्हा…….!!कि ……आप को याद कर...
15/08/2017

पलकें झुकें , और नमन हो जाए…….!!
मस्तक झुके, और वंदन हो जाए……!!
ऐसी नज़र, कंहाँ से लाऊँ, मेरे कान्हा…….!!
कि ……
आप को याद करूँ ,और आपके, दर्शन हो जाए……!!
जय श्री कृष्णा
कान्हा के चरणो में

पलकें झुकें , और नमन हो जाए…….!!मस्तक झुके, और वंदन हो जाए……!!ऐसी नज़र, कंहाँ से लाऊँ, मेरे कान्हा…….!!कि ……आप को याद कर...
15/08/2017

पलकें झुकें , और नमन हो जाए…….!!
मस्तक झुके, और वंदन हो जाए……!!
ऐसी नज़र, कंहाँ से लाऊँ, मेरे कान्हा…….!!
कि ……
आप को याद करूँ ,और आपके, दर्शन हो जाए……!!
"जय श्री कृष्णा"

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवा....
09/08/2017

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवा....

आंख वालों ने तुमको है देखा...और, कान वालों ने तुमको सुना है ...लेकिन, तेरा दर्शन उसी को हुआ है...जिसकी आंखों पे पर्दा नह...
27/06/2017

आंख वालों ने तुमको है देखा...
और, कान वालों ने तुमको सुना है ...
लेकिन, तेरा दर्शन उसी को हुआ है...
जिसकी आंखों पे पर्दा नहीं है...
Hari Bol!! 👏

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