31/05/2025
लखनऊ की ट्रैफिक व्यवस्था और ई-रिक्शा: सुधार की जरूरत या अनदेखी का परिणाम?
करीब 4-5 वर्ष पहले लखनऊ की सड़कों पर ट्रैफिक व्यवस्था सराहनीय थी — सुव्यवस्थित, अनुशासित और सहज। लेकिन हाल के वर्षों में हालात धीरे-धीरे बिगड़ते जा रहे हैं, और इसकी एक बड़ी वजह शहर में बेतरतीब तरीके से दौड़ते ई-रिक्शा हैं।
इन वाहनों के चालकों की मानसिकता समझ से परे है — यातायात नियमों की अनदेखी करना, सड़कों के बीचोंबीच सवारी बैठाना और गलत दिशा में चलना जैसे कृत्य अब आम हो चुके हैं। पैसेंजर के लालच में अक्सर ये चालक न तो सिग्नल का ध्यान रखते हैं, न ही ज़ेब्रा क्रॉसिंग या लेन डिसिप्लिन का। परिणामस्वरूप, लखनऊ की ट्रैफिक व्यवस्था अब कानपुर जैसी अव्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
प्रशासन चाहे तो इस पर नियंत्रण पा सकता है। लेकिन यदि हर जगह ट्रैफिक पुलिस तैनात करनी पड़े, तो अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर असर पड़ेगा। ऐसे में, ज़रूरत है एक सामूहिक प्रयास की — प्रशासन, पुलिस, जनता और सामाजिक संगठनों को मिलकर इस दिशा में कदम उठाने होंगे।
हम सुझाव देते हैं:
मुख्य चौराहों और प्रतिबंधित क्षेत्रों में ई-रिक्शा की एंट्री पर सख्ती से रोक लगे।
रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस की अनिवार्यता सुनिश्चित की जाए।
चालकों को ट्रैफिक नियमों की अनिवार्य ट्रेनिंग दी जाए।
आम नागरिक भी जागरूक बनें और नियमों के पालन में सहयोग करें।
लखनऊ सिर्फ 'नवाबों का शहर' नहीं, बल्कि अनुशासन और संस्कृति का भी प्रतीक है। यदि आज हमने स्थिति पर ध्यान नहीं दिया, तो वह दिन दूर नहीं जब "स्मार्ट सिटी" की जगह लखनऊ को "अव्यवस्थित शहर" कहा जाएगा।
आइए, मिलकर ट्रैफिक व्यवस्था को फिर से सुचारु बनाएं। यह हमारी ज़िम्मेदारी भी है और शहर के सम्मान की बात भी।