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16/03/2021

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29/01/2021

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We commit to keeping evolving our products with futuristic and customer-oriented mobility solutions.

19/10/2020
19/10/2020

#नवरात्र_अनुष्ठान करने वाले अधिकांश साधक अपने
पुराने ढर्रे के अभ्यस्त हो जाते हैं। आदत अचानक नहीं बदलती, उसके लिए बहुत सावधानी से मन को तैयार करने तथा अभ्यास क्रम बनाने की जरूरत होती है। अधिकतर लोग किसी प्रकार जप संख्या पूरी करने तथा खानपान के, उपवास के कुछ नियम निभा लेने भर के
अभ्यस्त होते हैं। अब अपनी सोच तथा क्रम युगऋषि के अनुभवों और निर्देशों के अनुसार बदलने की तत्परता बरतनी होगी। उसके कुछ सूत्र इस प्रकार हैं :-

#अनुष्ठान :- का अर्थ होता है इष्ट की निकटता और उसके अनुग्रह पाने के लिए मन में ठान लेना। अपने बहिरंग कार्यों और अन्तरंग अभ्यासों को इष्ट
उद्देश्य के अनुरूप अगली कक्षा में पहुँचाने का अटल
संकल्प कर लेना। उसके लिए अथक प्रयास करने का साहस संजोना और अविचल निष्ठा से पूरी सामर्थ्य झोंक देना।
साधना के हर चरण में कर्मकाण्ड के साथ उपयुक्त
विचारों और भक्ति भावों का समावेश करना जरूरी है। संकल्प से पूर्व अपनी गहन समीक्षा करें। नैष्ठिक साधक-सच्चे भक्त के अनुरूप, कौन-कौन सी
वृत्तियाँ अपने अन्दर हैं?
उन्हें अगले चरण में कहाँ तक पहुँचाना है?
किन-किन प्रवृत्तियों को जाग्रत करना है?
इस स्पष्ट समीक्षा के साथ अगले स्तर तक पहुँचने का
संकल्प मन में जमाकर ही संकल्प का कर्मकाण्ड निभाना हितप्रद होता है।

#षट्कर्म साधनात्मक मनोभूमि बनाने के बहुत श्रेष्ठ
माध्यम हैं। उन्हें चिन्हपूजा की तरह पूरा करना ठीक नहीं हर चरण में उपयुक्त विचारों और भावों का समावेश करें। समय कुछ अधिक लगे तो लगने दें।

#पवित्रीकरण :- काया के साथ वाणी और मन की
पवित्रता जरूरी है। साधक यथासाध्य शरीर और वस्त्रों की स्वच्छता पर तो ध्यान देते ही हैं, वाणी और मन की पवित्रता के लिए मन्त्रशक्ति और भावशक्ति का सहयोग लिया जाता है। इस क्रिया के साथ हमारी इन्द्रियाँ, वाणी और मन में हमारी भावना और गुरु-इष्ट के अनुग्रह से वाञ्छित पवित्रता का संचार होने का बोध करना चाहिए।

#शिखा_वंदन :- शिखा मुल उस स्थान पर होता है जहाँ चेतन मस्तिष्क का स्थान (सेरीबलम) होता है। वहाँ दिव्य तेज का प्रवेश हो, जो भावों-विचारों और क्रियाओं को तेजस्विता प्रदान करे, ऐसा भाव करना चाहिए।

#प्राणायाम :- अपने अन्दर का प्राण संसार के संसर्ग से मलिन हो जाता है। उसे दिव्य प्राण के विराट समुद्र से जोड़कर प्राणों को इतना प्रखर बनाने के भाव से प्राणायाम करें, जो साधना मार्ग में आने वाली भीतरी और बाहरी बाधाओं को चीरकर इष्ट लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ता रह सके।

#न्यास :- हमारी इन्द्रियाँ नश्वर सांसारिक रसों में लिप्त हैं। उन्हीं में अपनी सार्थकता देखती हैं। उनमें
दिव्य-सनातन रसों का आस्वादन करने की प्रवृत्ति पैदा करने के भाव से एक दिव्य अनुबन्ध करने, दिव्य
शक्तियाँ धारण करने के पैने विचारों और भावों के साथ
न्यास किया जाना चाहिए।

#जप के माध्यम से इष्ट के सर्वव्यापी दिव्य स्पंदनों के
साथ स्वयं को जोड़ने का भाव किया जाता है। दिव्य मन्त्र के स्पंदन हमारे शरीर में फैल रहे हैं, वे इष्ट के दिव्य स्पंदनों के साथ हमारे व्यक्तित्व के कण-कण को जोड़ने में, झंकृत करने में सक्षम हैं। जप के साथ यह विचार और भाव निरन्तर जाग्रत रहने चाहिए। मन्त्र जप की गति तेज करने के प्रयासों से यह मूल भाव लुप्त होने लगता है, केवल जप संख्या किसी प्रकार पूरी करने पर ही मन केन्द्रित हो जाता है। जप की गति स्वभावानुसार इतनी रखें जिससे जप के साथ इष्ट से एकत्व का भाव खण्डित न होने पाये। युगऋषि ने लिखा है कि जप संख्या तो मन को लम्बे समय तक इष्ट में डुबोने के उद्देश्य से निर्धारित की जाती है। भगवान के रिकॉर्ड में जप संख्या दर्ज नहीं होती, मन कितनी देर तक इष्ट बोध में लीन रहा, यही परखा जाता है।

#ध्यान :- निराकार या साकार ध्यान अपनी मानसिकता के अनुसार करें। निराकार ध्यान में सूर्य के प्रकाश या वायु मण्डल की तरह इष्ट की चेतना अपने सभी ओर होने का भाव दृढ़ किया जाता है। जल में मछली की तरह, वायु में पंछी की तरह, यज्ञकुण्ड में समिधा की तरह इष्ट चेतना में साधक के होने की धारणा की जा सकती है। साकार ध्यान में इष्ट का आशीर्वाद पाने, उसके स्पर्श का दिव्य बोध करने, उसके सामने अपने मन, अंतःकरण को विकारों से खाली करके उन्हें संस्कारों द्वारा भरे जाने का भाव किया जा सकता है।

✍🏻 पंडित श्री राम शर्मा आचार्य

03/05/2020
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03/05/2020

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18/02/2020

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