14/01/2023
आज का इतिहास - 01 माघ 1705 - 40 सिखों का शहीदी दिवस
माघ का महीना सिख इतिहास में बहुत महानता रखता है, इस दिन 40 सिख जिन्हें चालीस मुक्ते भी कहा जाता है, उनका आज शहीदी दिवस है, और मेरा इन सभी योद्धाओं को शत शत प्रणाम है I
इतिहास
माना जाता है कि जब गुरु गोबिंद सिंघ जी आनंदपुर साहिब में थे, और मुगलों ने किले को हर तरफ से घेर कर रखा था तो उस वक़्त कुछ सिख गुरु साहिब का साथ छोड़ कर जाना चाहते थे, तो गुरु साहिब ने कहा था कि अगर वह चाहे तो उन्हें छोड़कर जा सकते हैं लेकिन उन्हें यह बात लिख कर देनी होगी। उन्हें यह लिखना होगा कि वह अब गुरू के साथ रहना नहीं चाहते हैं और अब वह उनके सिख नहीं है।
तो इन सभी ने लिख कर दिया और घर लौट गए, जब सभी वापस लौट कर अपने-अपने घर में गए तो उनके परिवार के सदस्यों ने उनका स्वागत नहीं किया और कहा कि वह मुसीबत के समय में गुरू जी को अकेले छोड़कर आ गए है। सिखों को अपने ऊपर शर्म आने लगी और उनकी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह दुबारा से गुरू साहिब का सामना कर सकें, इस समय में माता भाग कौर जी ने बहुत वीरता दिखाई, और उन सिखों में फिर से जोश भरा, उन्हें गुरु साहिब के पास लौटने का एक अच्छा मौका भी दिया, इस वक़्त गुरु साहिब मुक्तसर में पुँहचे हुए थे, जिसे खिदराने की ढाब कहा जाता था ।
यह वह समय था जब चारों साहिबज़ादों की शहीदी हो चुकी थी, और मुगल सैनिकों गुरू जी को ढूंढते हुए यहाँ पहुंच चुकी थी, गुरू जी अपने कुछ सिखों के साथ युद्ध में जाने को तैयार थे, कि उधर से माता भाग कौर जी के साथ वही चालीस सिख आते हैं, और युद्ध में शामिल हो जाते हैं, उन चालीस सिक्खों ने मुगल सैनिकों के साथ युद्ध किया और इस लड़ाई में वह सफल भी हुए, लेकिन वह सभी सिख शहीद हो गए, और उन्होंने अपने गुरू से टूटा हुआ रिश्ता पुनः जोड़ लिया , जब गुरु साहिब शहीद सिखों को देख रहे थे तो भाई महा सिंघ जो आखिरी साँसे ले रहे थे, गुरु साहिब उनके पास गए, अपनी गोद में उसका सिर रखा और पूछा कि यदि कोई आखिरी इच्छा है तो मुझे बताओ, तो भाई महा सिंघ जी ने कहा कि गुरु जी आप पास है और मुझे क्या चाहिए, यदि हो सकता है तो वह पत्र (बेदावा) फाड़ दीजिये, जिसपर हमने लिखा था कि हम आपके सिख नहीं, तो गुरु साहिब ने उसी वक़्त उसे फाड़ दिया, गुरू जी इन सभी सिखों को बहुत प्यार दिया और इन्हें चालीस मुक्तों का नाम दिया I
इन चालीस सिखों के नाम से, मुक्ती का "सर" (सरोवर) जाना जाता है, मुक्तसर के नाम से जाना जाता है I