01/05/2024
भारत में #मज़दूर_दिवस की परिकल्पना #डॉआंबेडकर के बिना अधूरी हैं। भारत मेंशायद ही कोई और हो जिसने मज़दूरों भारतीय के हक़ और हुक़ूक़ की लड़ाई लड़ी हो। लेकिन बाबा साहेब को सिर्फ़ #दलितों नेता के रूप में स्थापित कर दिया गया हैं।
जातीय द्वेष की ऐसी मानसिकता सिर्फ़ भारत में ही देखने को मिलती हैं। यहाँ मज़दूर भी जातियता के कारण एक होकर अपने अधिकारों की लड़ाई भी न लड़ पा रहे हैं। भारतीय आमजन के #जातिवाद और #पूंजीवाद दो ही दुश्मन हैं।
बाबा साहब ने 15 अगस्त 1936 को इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की थी, उसके टिकट पर वे निर्वाचित हुए।
17 सितम्बर, 1937 को महारों को गुलाम बनाए रखने के लिए चली आ रही ्रथा खत्म करने के लिए विधेयक पेश किया था।
12 जनवरी 1938 को इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के बैनर तले ही डॉ अम्बेडकर ने किसानों के संघर्ष का नेतृत्व किया कोलाबा, रत्नागीरि, सातारा और नासिक जिलों के 20,000 किसान बम्बई में जमा हुए थे।
12-23 फरवरी 1938 को मनमाड में अस्पृश्य रेलवे कामगार परिषद की सभा की अध्यक्षता करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा- ‘भारतीय मजदूर वर्ग ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोनों का शिकार है और इन दोनों व्यवस्थाओं पर एक ही सामाजिक समूह का वर्चस्व है। लेकिन कांग्रेस, सोशलिस्ट और वामपंथी तीनों अस्पृश्य कामगारों के विशेष दुश्मन ब्राह्मणवाद से संघर्ष करने को तैयार नहीं हैं।’
7 नवंबर 1938 को डॉ अम्बेडकर के नेतृत्व में एक लाख से ज्यादा मजदूरों की हड़ताल ने मुंबई इस हड़ताल के बाद सभा को संबोधित करते हुए कहा- " #मजदूर मौजूदा लेजिस्लेटिव काउंसिल में अपने प्रतिनिधियों को चुनकर सत्ता अपने हाथों में ले लें।"
सितंबर 1938 में बम्बई विधानमंडल में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने औद्योगिक विवाद विधेयक प्रस्तुत किया, जसमें हड़ताल को आपराधिक कार्रवाई की श्रेणी में डालने दिया जाये।
डॉ. आंबेडकर ने विधानमंडल में इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा- ‘ #हड़ताल करना सिविल अपराध है, फौजदारी गुनाह नहीं। किसी भी आदमी से उसकी इच्छा के विरूद्ध काम लेना किसी भी दृष्टि से उसे दास बनाने से कम नहीं माना जा सकता है। श्रमिक को हड़ताल के लिए दंड देना उसे गुलाम बनाने जैसा है। हड़ताल एक मौलिक स्वतंत्रता है जिस पर मैं किसी भी सूरत में अंकुश नहीं लगने दूंगा। यदि स्वतंत्रता कांग्रेसी नेताओं का अधिकार है, तो हड़ताल भी श्रमिकों का पवित्र अधिकार है।’
लेकिन कांग्रेसियों ने इस विधेयक को पास करवा लिया, डॉ अम्बेडकर ने इसे ‘काला विधेयक’ कहा और विरोध में लेबर पार्टी के झंडे तले 7 नवंबर 1938 को हड़ताल बुलाई।
27 नवंबर 1942 को हुई सातवीं लेबर कॉन्फ्रेंस में बाबा साहब ने काम के घंटे 14 से घटाकर 8 कर दिए। बिल पेश करते हुए बाबा साहब ने कहा- ‘काम के घंटे घटाने का मतलब है रोजगार का बढ़ना लेकिन काम का समय 12 से 8 घंटे किये जाते समय वेतन कम नहीं किया जाना चाहिए।’
बाबा साहब ने मजदूरों को दुर्घटना बीमा, प्रोविडेंट फंड, टीए-डीए, मेडिकल लीव और छुट्टियों जैसे लाभ भी दिलाए।
29 जुलाई 1943 माइंस मैटरनिटी बेनेफिट (अमेंडमेंट) बिल पर बोलते हुए बाबा साहब ने कहा- ‘यह काम से अनुपस्थित या ‘काम से’ शब्द को हटाने के लिए है, जो मातृत्व लाभ अधिनियम की धारा 5 से अस्पष्टता का कारण बनता है और इस खंड को इस आशय को पढ़ने के लिए सलाह दी जाती है कि ‘चार सप्ताह से पहले हर दिन महिला को प्रसव से पहले मातृत्व लाभ का हक हो।’
असेंबली में महिलाओं के समान वेतन पर बाबा साहब ने कहा था- ‘हमें इसका भी ख्याल रखना चाहिए कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान वेतन मिले। मुझे लगता है कि ये पहली बार है जब किसी इंडस्ट्री में समान काम के लिए समान वेतन देने का सिद्धांत लागू किया गया है वो भी बिना किसी लैंगिक भेदभाव के। हमें इसका भी ध्यान रखना होगा कि महिलाएं उस गलियारे में काम ना करें जो साढ़े 5 फीट से छोटा हो।’
13 नवंबर 1943 को बाबा साहब इंडियन ट्रेड यूनियन (अमेंडमेंट) बिल लेकर आए थे ताकि फैक्ट्री मालिक ट्रेड यूनियन्स को मान्यता दें। इसके बाद ही दुर्घटना का बीमा जो बाद में ईएसआई कानून बना, कोयला और माइका कर्मचारियों के प्रोविडेंट फण्ड और सारे मजदूरों के प्रोविडेंट फंड्स भी अस्तित्व में आये।
बाबा साहब ने मजदूरों की भलाई के लिए निम्न बिल ड्राफ्ट किए।
1. द कोल माइंस सेफ्टी (स्टॉविंग) बिल
2. द फैक्ट्रीज़ (अमेंडमेंट) बिल
3. द फैक्ट्रीज़ (सेंकड अमेंडमेंट) बिल
4. वर्कमेन कम्पेन्सेशन (अमेंडमेंट) बिल
5. द इंडियन माइंस (अमेंडमेंट) बिल
6. वर्कर्स वेलफेयर एंड सोशल सिक्योरिटी बिल
7. मीका माइंस वेलफेयर बिल
8. इंड्स्ट्रियल वर्कर्स हाउसिंग एंड हेल्थ बिल
9. टी कंट्रोल (अमेंडमेंट) बिल.
#हर्षवर्धन_असुर
#पूर्व_राष्ट्रीय_अध्यक्ष